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कांग्रेस की यह शरुआत ठीक नही

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मुख्यमंत्री पद के लिए एक नाम को 2 दिनों तक इस तरह ना फिर भी सहमत ना बना पाना बहुत हताशाजनक है जिससे जनता के बीच गलत संदेश गया है

छत्तीसगढ़ में अकेले अपने बूते और मध्यप्रदेश व राजस्थान में समर्थन देने वाले दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही कांग्रेस में मुख्यमंत्रियों के चयन को लेकर असमंजस का तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच जाना लोकतंत्र की विसंगति के बारे में ही बताता है। जिन मतदाताओं ने कांग्रेस को बढ़-चढ़कर वोट दिया था अपने सत्ता के लिए नेताओं को रोते देखने को विवश हैं आदर्श स्थितियां की नियति राज्य के नवनिर्वाचित विधायक अपना नेता चुनने पर कांग्रेस की आलाकमान परंपरा में मुख्यमंत्री दिल्ली से ही तय होते हैं। हालांकि इस मामले में दूसरी पार्टियों का भी कांग्रेसीकरण हो चुका है और भाजपा भी कोई अपवाद नहीं है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के समर्थकों के बीच नारेबाजी और झड़प मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के
समर्थकों के बीच नारेबाजी तथा छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव समर्थकों के बीच भिड़ंत तो आति है कांग्रेस की आज अगर लोगों के बीच पहचान कम होती गई है तो इसकी बड़ी वजह है कि वह खुद को समय के अनुरूप नहीं डाल पाई बेशक एक लोकतांत्रिक पार्टी में संवाद और बहस की गुंजाइश हमेशा होनी चाहिए फिर मुख्यमंत्री चुनते हुए तमाम समीकरणों का ध्यान रखना पड़ता है। जिससे कई बार विलंब भी होता है पर तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री पद के एकाधिक दावेदारों ने अब तक इस प्रवृत्ति का दिया उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। इससे पहले चुनाव में भी टिकट वितरण से लेकर पोस्टरों में तस्वीरों में ना होने को लेकर भी गुटबाजी का चरण लिखा गया एक तरफ राज्यों के निर्वाचित विधायकों ने मुख्यमंत्री के लिए पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को अधिकृत कर दिया। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पद के दावेदार अपने समर्थकों के जरिए अपनी ताकत का प्रदर्शन करने से भी नहीं चूक रहे राहुल गांधी के समझाने का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ इससे स्पष्ट होता है कि लोकसभा चुनाव में हाशिए पर सिमट जाने के बाद भी कांग्रेस ने सबक नहीं सीखा अपने तौर-तरीकों के कारण वह पहले ही अपनी राजनीतिक जमीन का बड़ा हिस्सा हो चुकी है। अगर सत्ता के लिए उसके नेता इसी तरह लड़ते दिखे तो जनता के बीच इसका गलत संदेश जाएगा और 2019 की और कठिन हो जाएगी।

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